Opinion: मौत सिर्फ आंकड़ा भर नहीं है, इन्हीं आंकड़ों में छुपी है ज़िंदगी और मौत


सरकारी विभागों और अस्पतालों के लिए मौत एक आंकड़ा भर हो सकती है, लेकिन उनके लिए नहीं जिनके परिवार से कोई अपना चला गया हो, जिनका एक मात्र रोटी कमाने वाला चला गया हो. जिनके घर का मुखिया असमय चला गया हो. असामयिक मौत का असर उस परिवार पर तो होगा ही साथ ही आने वाली पीढ़ियां भी इससे प्रभावित होंगी.

इस कोरोना की विकट घड़ी में आपने ज़रूर पढ़ा होगा कि पूरे देश में किस तरह हजारों बच्चे देखते-देखते अनाथ हो गए. ऐसे बच्चे भी हजारों में हैं जिनके माता-पिता दोनों नहीं रहे. इनके लिए ज़रूरी है कि हर उस मौत का हिसाब हो.

आज ही हमारे सामने पटना जिले के धनरूआ प्रखण्ड की एक तस्वीर सामने आई, जहां मुन्नी कुमारी के शिक्षक पति की कोरोना से 15 अप्रैल को एनएमसीएह में मौत हो गई, लेकिन दो महीने बाद भी उस महिला को मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं मिल पाया. मुन्नी कुमारी की तीन बेटियों और एक बेटे का लालन-पालन करने वाला आज कोई नहीं है.

महिला का पति एक निजी स्कूल में शिक्षक था इसलिए उसे पेंशन भी नहीं मिलेगी. ऐसे में सरकार से मिलने वाली 4 लाख की राशि ही उसके लिए एक मात्र आशा है. हर उस मुन्नी कुमारी के लिए मौत की गिनती ज़रूरी है. हर परिवार को घर के मुखिया या किसी सदस्य की मृत्यु के बाद मुआवजा मिले. इसलिए आंकड़े दुरुस्त किए जाएं.हर मौत का हिसाब है ज़रूरी

बिहार की सियासत में पीछले दिनों बड़ी हाय-तौबा मची जब मौत के आंकड़ों का ऑडिट हुआ. देखते ही देखते मृतकों की लिस्ट में 3900 नए नाम शुमार हो गए. बिहार कोरोना से हुई मौतों के हिसाब में 15 स्थान से खिसककर 12 नंबर पर आ गया.

पहले समझें, ऐसा क्यों हुआ? जिलों में निजी अस्पतालों में आंकड़ों को छुपाने या अपडेट नहीं करना इसकी प्रमुख वजह बताई जा रही है. आंकड़ों को अपडेट करने का काम कई दिनों से चल रहा था, इसलिए यह अचानक नहीं हुआ।. बिहार में कोरोना जांच को लेकर आंकड़ों में हुई हेरा-फेरी की जांच अभी चल ही रही है, जिसको राज्य सरकार ने खुद भी स्वीकारा था. इसलिए जब मौत को लेकर आंकड़ों की हेरा-फेरी की खबर आई तो प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही थी.

कम से कम नीतीश कुमार ने हिम्मत तो दिखाई

नीतीश कुमार की इस वजह से आलोचना होनी चाहिए कि अधिकारियों ने डेटा के साथ कहीं न कहीं घालमेल किया. अधिकारियों ने मृतकों की सूची को अपडेट नहीं कर उनके परिवार को सरकार से मिलने वाले 4 लाख क मुआवजे से वंचित करने की कोशिश की. लेकिन नीतीश कुमार की इस बात के लिए तारीफ करनी चाहिए कि उन्होने अधिकारियों को इस बात की इजाज़त दी कि वो हर उस मौत का हिसाब तैयार करें जो इस कोरोना काल में हुई हों.

पंचायत स्तर से आंकड़े आए, तो मृतक और बढ़ेंगे

हमारी जानकारी के मुताबिक अभी ब्लॉक या पंचायत स्तर पर हुई मौतों को जब जोड़ा जाएगा तो आंकड़े और ऊपर आएंगे. इस बात को स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी अभी से स्वीकार रहे हैं. इसकी एक मुख्य वजह यह भी है कि डॉक्टरों के अलावा राज्य में उन कर्मचारियों की भी कमी है जो 18 घंटे काम करके भी डेटा को कम्प्युटर में फीड नहीं कर पा रहे हैं.

आज जब आप वैक्सीनेशन सेंटर पर जाएंगे तो जितना वक़्त टीका लेने में लगता है उससे कहीं ज़्यादा अपना नाम सिस्टम में इंटर करवाने में चला जाता है. राज्य में आम तौर हुई मौतों के बाद, मृत्यु प्रमाण पत्र लेने में लोगों के पसीने छूट जाते हैं. हजारों लोग अब भी अपने करीबियों की मौत का प्रमाण पत्र नहीं ले पाये हैं. किसी परिवार को अगर समय पर प्रमाण पत्र नहीं दिया जाए तो आप समझ सकते हैं कि घर और व्यवस्था के ऊपर इसका कितना दबाव पड़ेगा.

सूचना क्रांति के दौर में अधिकारियों को समझना पड़ेगा कि वो देरी तो कर सकते हैं लेकिन कोरोना से हुई मौतों को झुठला नहीं सकते. ये सरकार और समाज हित में भी है कि कोरोना से हुई एक-एक मौतों का हिसाब हो ताकि उन बेसहारों को मुआवजा मिल सके. इससे हम भविष्य में होने वाली आपदा के लिए तैयार हो सकेंगे.

अभी तीसरे कोविड फेज के संभावित खतरों से लड़ने की तैयारियों पर ज़ोर होना चाहिए. ऑक्सिजन प्लांट लगाने पर फोकस होना चाहिए, साथ ही उन अधिकारियों पर भी शिकंजा कसना चाहिए जो आंकड़ों की बाज़ीगरी करने में उस्ताद हैं.

नीतीश कुमार पर जुबानी हमला करने वालों को इस बात का जवाब देना चाहिए  कि क्या किसी प्रदेश में कोरोना से हुई मौतों का ऑडिट भी हो रहा है? क्या किसी मुख्यमंत्री में है इतना नैतिक बल, अगर साहस है तो अभी देर कहां हुई है? (ये लेखक के निजी विचार हैं)




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