लोग भुलाए लागल नेवान के माने, जानीं का होला एकर मतलब


विकास के अइसन बयार बहलि कि अब त सालोभर हर चीजु मिलता. आजु से बीस-पचीस साल पहिले मुरई, टमाटर, कोबी आ पालकी के साग खालि जड़वा में मिलत रहल हा. जेकर भागि ठीक रहत रहल हा, उहे खिचड़ी के दिने मटर के छेमी के पहिलका सवाद लेत रहल हा. भोजपुरी में पहिलका सवाद खातिर बाड़ा बढ़ियां शब्द बा, नेवान. खिचड़ी के दिने दही-चिउरा में उभला-चुभला के बाद सांझि खा जब खिचड़ी बनी त आपाना खेत के पहिलका छेमी के दाना ओही में डालात रहल हा. ओहि के खाइल जाइ त ओकरा के नेवान कहल जात रहल हा. अब त सालोभर छेमी मिलता. सहर छोड़ीं, गांव तक में सालोभर टमाटर, छेमी, कोबी मिलि रहल बा.

नेवान भोजपुरी के अइसन शब्द बा, जेकर जोड़ शायदे कवनो भाषा में होखे. नेवान माने सीजन के फल, अनाज, तरकारी के पहिलका सवाद. ओइसे त खाइल-पियल भारतीय सभ्यता में पवित्रता के बोध से भरल रहल हा. ईहां भोजन बनावल, ओकरा के परोसल आ खियावल सभ्यता के हिस्सा रहल हा. एकर असर नेवान शब्द में भी रहल हा. नेवान माने पवित्रता बोध के संगे पूरा धार्मिक भाव से भगवान आ प्रकृति के धन्यवाद देत पहिलका सवाद. लेकिन विकास के हवा संगे अब नेवान के लोग भुलाइल जाता. सहर के का कहीं, गांवों में लोग एह के माने बिसरल जात बा.

भारत में खेती-किसानी के हजारों-हजार साल के परंपरा बा. इहां के समूची जिनगी के चक्कर खेती-किसानी आ मौसमे पर केंद्रित रहल बा. एही वजह से हर सीजन में आवे वाला नवका फल, तियन-तरकारी, आदि के नेवान के खास दिन जुड़ल रहल हा. जइसे आम के टिकोढ़ा के नेवान के दिन सदियन से तय रहल हा, सतुआन. आजुकाल्ह बैसाखी पूरा दुनिया में मसहूर हो गइल बा. तेरह अप्रैल के दिन 1919 में बैसाखिए के दिने जलियांवाला बाग में जनरल डायर सैकड़न लोगन के गोली से भूनि देले रहे. पंजाब-हरियाणा में बैसाखी खेती के कामकाज से फुरसत मिलला के बाद उपजल उल्लास के तेवहार हा. बाकिर भोजपुरिया समाज में ई तेवहार सतुआन के नाम से मनावल जाला. एह दिन पवित्र पोखरा, सरोवर, नदी में नहान के महत्व बा, ओहू में अगर सरजू में नहाए के मिलल त समझीं कि जिनकी सकारथ हो गइल. एह दिन सतुआ के भोग लगावे के परंपरा बा. एही सतुआ संगे आम के टिकोढ़ा के पहिलका भोग लगावे के लोक विधान रहल बा. जवना के हमनीं नेवान कहत रहली हा जा. टिकोढ़ा के नमकीन चटनी बना के सतुआ संगे नेवान होई, भा सांझि का बने वाली पिसान के मिठकी कढ़ी, जवना के भोजपुरिया समाज गुर्हुमा कहेला, ओह में टिकोढ़ा के छीलि-काटि के फांकि फारि के डालात रहल हा.
टिकोढ़ा के फांकी पर भिखारी ठाकुर के रचना के एगो लाइन यादि आवतिया…तोहार अंखिया जइसे अमवा के फंकिया…

यानी नायिका के आंखि ओइसने कटावदार बिया, जइसे आम के फांकी…

हर साल जइसे बूनि परल सुरू होई, भोजपुरिया समाज अपना घर में छांन्हीं पर टांगल लउका, कोंहड़ा, घेंवड़ा, चिचिड़ा, खीरा आदि के पुरान सूखल फल उतारत रहल हा, ओकरा में से बिया निकालि आ घर-दुआर के अगवाड़े-पिछवाड़े खाली जगहि पर ऊ बिया रोपि दिहें. कुछु दिन में मुसरी के कान नियर ओह में से आंकुर फूटी आ देखते-देखते ऊ लतरि बनि जात रहल हा. ओकरा बाद एगो अइसनो दिन आवत रहल हा कि ओके खपरैल या छान्हि पर चढ़ावे खातिर इंतजाम करे के परे. ओकरा खातिर अलगा से छान्हि को छावात रहल हा. जइसहीं कुवार के महीना आई कि लागि ऊ फुलाए-फरे. ओकरो पहिलका फर पहिले गांव के मंदिर पर दियात रहल हा. ओकरा बाद वाला फर पंडिजी के दियाई. फेरू घर के लोग ओकर तरकारी नेवान करत रहल हा. अभियो इ परंपरा उहवां बांचल बा, जहवां छान्हि छावाता आ लउका-कोंहड़ा छान्हि पर चढ़ावल जाता.

एही तरी जब घर में गाइ-भंइसि बच्चा दिही त 21 दिन ले ओकर दूध के घर के कवनो बूढ़-पुरनिया ना खाई. 21 दिन के बाद दूध पवितर मानल जाला. ओकरा बाद गाइ के दूध के कांचहि पंडिजी के दियाई. ओह में कुछु हिस्सा ऊ गांव के हर देवी-देवता किहां चढ़ावत रहले हा, आ बांचल आपना घरे ले जइहें. एकरा बाद वाला दूध गांव के मंदिर पर दियात रहल हा. फेरू ओह दूध के नेवान घर के उ बूढ़-पुरनिया करत रहले हा,जो 21 दिन तकले बरवले रहले हा.

ओइसे गांव में रहे वाला समाज अबो एह सब परंपरा के जियता. ऊ आपाना कमाई आ अरजन में प्रकृति,समाज आ आपना से जुड़ल लोगन के हिस्सेदारी अबो मानेला. एह वजह से ई परंपरा थोड़-बहुत अब ले जियतिया. बाकिर दू राय नइखे कि ई सब परंपरा पीछे छूटल जा तारी स. पहिले त कथित रूप से आइल आधुनिक शिक्षा एह परंपरन के दकियानूसी बता के विरोध कइली स, फेरू आइल उदारवाद आ नव आर्थिकी हमनि के नजरिया के संकुचित करे लागल. लेकिन सौभाग के बात बा कि लोग फेरू अपना परंपरा के ओरि लवटता, आपन जड़ आ विरासत के खोजता आ ओकरा संगे आपन अस्तित्वो तलाशि रहल बा. (लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं.)




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