मुख्तार अंसारी के चलते इस्तीफा देने वाले DySP शैलेन्द्र सिंह क्या फिर हो सकते हैं बहाल? जी नहीं, जानिए क्यों?


लखनऊ. इस वक्त जबकि माफिया डॉन मुख्तार अंसारी (Mafia Don Mukhtar Ansari) की चर्चा जोरों पर है, तब यूपी पुलिस के डिप्टी एसपी रहे शैलेन्द्र सिंह (Former DySP Shailendra Singh) की चर्चा भी खूब हो रही है. आखिरकार मुख्तार अंसारी पर कार्रवाई के कारण उन्हें इतनी शानदार नौकरी जो छोड़नी पड़ी थी. सोशल मीडिया में इस बात की मांग तेजी से उठी है कि शैलेन्द्र सिंह को दोबारा बहाल किया जाये. लोगों में मन में इसकी आस इसलिए जग गयी है क्योंकि सीएम योगी और पीएम मोदी दोनों ने शैलेन्द्र सिंह का उनके गर्दिश के दिनों में सलामती पूछी थी. तो क्या शैलेन्द्र सिंह दोबारा यूपी पुलिस में अफसर बन सकते हैं?

सोशल मीडिया पर उनके पक्ष में तर्क देते हुए कहा जा रहा है कि जब यूपी पुलिस के ही अफसर IPS दावा शेरपा नौकरी छोड़कर दोबारा नौकरी में आ सकते हैं तो शैलेन्द्र सिंह क्यों नहीं? बिहार के डीजीपी रहे गुप्तेशवर पांडेय नौकरी छोड़कर दोबारा नौकरी में आ सकते हैं तो शैलेन्द्र सिंह क्यों नहीं? इनके पक्ष में महाराष्ट्र के चर्चित पुलिस अफसर सचिन वाझे का भी उदाहरण दिया जा रहा है. कहा जा रहा है कि सचिन ने 2007 में पुलिस फोर्स से इस्तीफा दे दिया था और 2020 में वापस ज्वाइन कर लिया था.

नहीं हो सकते बहाल, कारण ये ये…

लेकिन, सच्चाई ये है कि शैलेन्द्र सिंह अब दोबारा बहाल नहीं हो सकते हैं. अभी तक के किसी भी नियम के तहत उन्हें दोबारा नौकरी पर नहीं रखा जा सकता है. अब सवाल उठता है कि दावा शेरपा, गुप्तेश्वर पांडेय और सचिव वझे दोबारा नौकरी पर कैसे रखे गये? तो जवाब ये है कि इन सभी का मामला शैलेन्द्र सिंह से अलग है. अंतर ये है कि शैलेन्द्र सिंह ने इस्तीफा दिया था जबकि दावा शेरपा और गुप्तेश्वर पांडेय ने वीआरएस मांगा था. सचिव वझे निलम्बित था. तीनों मामलों में बहुत फर्क है.यूपी पुलिस के डीजीपी रहे विक्रम सिंह ने कहा कि इस्तीफा देने और उसे सरकार द्वारा स्वीकार किये जाने के बाद नौकरी में दोबारा वापसी नहीं हो सकती. शैलेन्द्र सिंह ने 11 फरवरी 2004 को इस्तीफा दिया था और 10 मार्च 2004 को इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया था.

दावा शेरपा, गुप्तेश्वर पांडेय और सचिव वझे नौकरी में दोबारा कैसे वापस आ गये?

IPS दावा शेरपा ने 2008 में वीआरएस मांगा था. इसके बाद ये दार्जिलिंग चले गये. वहां से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना चाह रहे थे. 2009 के लोकसभा के चुनाव में इनकी जगह दूसरे को टिकट मिल गया. निराश दावा शेरपा ने हार नहीं मानी और अगले तीन सालों तक जूझते रहे. थक हार कर 2012 में नौकरी फिर से ज्वाइन कर ली. दोबारा ज्वाइनिंग इसलिए हो सकी क्योंकि सरकार ने इनका वीआरएस तब तक मंजूर नहीं किया था. शेरपा कहते हैं कि जितने दिन वे नौकरी में नहीं रहे उतने दिन की बिना सैलरी की छुट्टी लेकर वापस नौकरी ज्वाइन की. शेरपा ने कहा कि उनके बारे में ये जानकारी गलत फैलायी गयी है कि उन्होंने टिकट न मिलने पर निर्दलीय ही चुनाव लड़ा था. उन्होंने न कोई चुनाव लड़ा और ना ही कोई पार्टी ज्वाइन की थी.

गुप्तेश्वर पांडेय  ने भी वीआरएस मांगा था

बिहार के डीजीपी रहे गुप्तेशवर पांडेय की भी यही कहानी है. पांडेय ने भी 2009 का चुनाव लड़ने के लिए वीआरएस लिया था लेकिन, जब टिकट नहीं मिला तो वापस नौकरी में आ गये. अब वीआरएस मिल गया है.

सचिन वझे का निलंबन बना कवच

महाराष्ट्र के पुलिस अफसर सचिन वझे की कहानी थोड़ी अलग है. मुम्बई के वरिष्ठ पत्रकार सुनील सिंह ने कहा, “सचिव वझे ने साल 2007 में जब महाराष्ट्र पुलिस से इस्तीफा दिया था तब वो निलंबित था.” साल 2020 में उसकी बहाली इसीलिए हो पायी क्योंकि निलंबन उसका कवच बन गय़ा. यदि सिर्फ इस्तीफा देने का मामला होता तो सचिन भी दोबारा बहाल न हो पाता.

वैसे शैलेन्द्र सिंह ये सच्चाई जानते हैं. इसीलिए उन्होंने कहा कि अब तो नौकरी छोड़े 17 साल हो गये हैं और मैंने ऐसा कोई विचार भी नहीं किया है, अब तो गंगा में बहुत पानी बह चुका है. मैं जिस फील्ड में काम कर रहा हूं अब उसी में मेरा मन रम गया है. बाकी किस्मत जहां ले जाये.

एलएमजी केस में मुख्तार पर लगाया था पोटा

बता दें कि साल 2004 में एसटीएफ की वाराणसी यूनिट में तैनाती के दौरान शैलेन्द्र सिंह ने सेना से चुरायी गयी लाइट मशीन गन (एलएमजी) 200 कारतूसों के साथ बरामद की थी. तब उन्होंने मुख्तार अंसारी के खिलाफ पोटा के तहत मुकदमा दर्ज किया था. आरोप था कि मुख्तार एलएमजी खरीद रहे थे. शैलेन्द्र सिंह के शब्दों में इसके बाद उनके उपर मुख्तार से केस खत्म करने का दबाव डाला गया और जब उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उन्हें प्रताड़ित किया जाने लगा. इससे तंग आकर उन्होंने यूपी पुलिस के डिप्टी एसपी पद से इस्तीफा दे दिया था.




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